हर कोई दिल की हथेली पे – अहमद फराज़

हर कोई दिल की हथेली पे है सहरा रक्खे
किस को सैराब करे वो किसे प्यासा रक्खे

उम्र भर कौन निभाता है तअल्लुक़ इतना
ऐ मिरी जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे

हम को अच्छा नहीं लगता कोई हमनाम तिरा
कोई तुझ सा हो तो फिर नाम भी तुझ सा रक्खे

दिल भी पागल है कि उस शख़्स से वाबस्ता है
जो किसी और का होने दे न अपना रक्खे

कम नहीं तम-ए-इबादत भी तो हिर्स-ए-ज़र से
फ़क़्र तो वो है कि जो दीन न दुनिया रक्खे

हँस न इतना भी फ़क़ीरों के अकेले-पन पर
जा ख़ुदा मेरी तरह तुझ को भी तन्हा रक्खे

ये क़नाअ’त है इताअत है कि चाहत है ‘फ़राज़’
हम तो राज़ी हैं वो जिस हाल में जैसा रक्खे

Ahmed ‘Faraz’

तुम ‘फ़राज़’ अपनी तरफ़ से तो निभाते जाते

रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं
दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं

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सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते
वर्ना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते

शिकवा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब से तो कहीं बेहतर था
अपने हिस्से की कोई शम्अ’ जलाते जाते

कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ
फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते

जश्न-ए-मक़्तल ही न बरपा हुआ वर्ना हम भी
पा-ब-जौलाँ ही सही नाचते गाते जाते

इस की वो जाने उसे पास-ए-वफ़ा था कि न था
तुम ‘फ़राज़’ अपनी तरफ़ से तो निभाते जाते


Another one that suits the mood…

आज कल अहमद ‘फराज़’ रात को मन की बातें पढ़ कर सुबह बयान कर देते है…

इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ
क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ

तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ

तू कि यकता था बे-शुमार हुआ
हम भी टूटें तो जा-ब-जा हो जाएँ

हम भी मजबूरियों का उज़्र करें
फिर कहीं और मुब्तला हो जाएँ

हम अगर मंज़िलें न बन पाए
मंज़िलों तक का रास्ता हो जाएँ

देर से सोच में हैं परवाने
राख हो जाएँ या हवा हो जाएँ

इश्क़ भी खेल है नसीबों का
ख़ाक हो जाएँ कीमिया हो जाएँ

अब के गर तू मिले तो हम तुझ से
ऐसे लिपटें तिरी क़बा हो जाएँ

बंदगी हम ने छोड़ दी है ‘फ़राज़’
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ

अहमद ‘फराज़’


रंजिश ही सही – अहमद फराज़


रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिये आ

अब तक दिल-ए-खुशफ़हम को हैं तुझ से उम्मीदें
ये आखिरी शम्में भी बुझाने के लिये आ

इक उम्र से हूँ लज्ज़त-ए-गिरया से भी महरूम
ऐ राहत-ए-जां मुझको रुलाने के लिये आ

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिये आ

माना के मोहब्बत का छुपाना है मोहब्बत
चुपके से किसी रोज़ जताने के लिए आ

जैसे तुम्हें आते हैं ना आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ

पहले से मरासिम ना सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रहे दुनिया ही निभाने के लिये आ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से खफा है तो ज़माने के लिये आ

Ahmed ‘Faraz’


अब के हम बिछड़े – अहमद फराज़


अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों  में मिलें,
जिस तरह सूखे हुए फूल  किताबों में मिलें

तू खुदा है, न मेरा इश्क फरिश्तों जैसा,
दोनों इंसान है तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

[हिजाबों = veil]

गम-ए-दुनिया भी गम-ए-यार में शामिल कर लो,
नशा बढ़ता है जब शराबें जो शराबों में मिलें

ढूंढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
यह खजाने तुझे मुमकिन है खराबों में मिलें

आज हम दार पे खेचे गए जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें

[दार = gallow; निसाबों = curriculam]

अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है ‘फ़राज़’
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmed ‘Faraz’


Though a 16min long version is more famous, I like this less known movie version by Mahendi Hasan.

The voice of Mahendi Hasan… रूमानी… रूह को छूने वाली…

Have to upload something special….

आंखों को वीजा नहीं लगता,

सपनों की सरहद नहीं होती,

बंद आंखों से रोज चला जाता हूं सरहद पार

मिलने… महेंदी हसन से…

A special poem from Gulzar to Mahendi Hasan… 😊

नज़र में रहते हो जब तुम नज़र नहीं आते…